Wednesday, January 23, 2013

शायद मै बड़ा हो गया

शायद मै बड़ा हो गया 
एक दिन अचानक thand  का ज़िक्र आते ही पापा ने कहा की आज हरी मटर खाने का मन कर रहा है, बस फिर क्या था, मैं झट से निकल पड़ा गाड़ी उठा कर बाज़ार की ओर . बहुत देर तक बारगेनिंग करने के बाद एक जगह से मटर की फलियाँ लेने का फैसला किया। एक किलो मटर सब्ज़ीवाले से मांगने के बाद मैं काफी गौर से उसके तराजू की तरफ देखने लगा की कही कम न तौले। खैर , जैसे ही उसने मुझे पैकेट हाथ में थमाया मुझे कुछ अजीब सा लगा। लगा जैसे की पैकेट कुछ हल्का था। मैंने एक बार फिर से पैकेट तौलने को कहा। दोबारा तुलवा लेने के बाद भी पैकेट कुछ हल्का था। या तो मटर में कुछ गड़बड़ था या मेरे हाथो में कुछ गड़बड़। क्योंकि पहले जब कभी भी मैंने मम्मी के साथ सब्जी के पैकेट उठाए थे तो वो अचे खासे भरी होते थे। लेकिन तभी एक बात का एहसास हुआ की शायद मेरे हाथो में जान जादा आ गयी है क्योंकि अब मैं बड़ा हो गया हूँ।
वोह मटर की फलियों से भरा पैकेट लेकर जब मुदा तो मेरे होश ही जैसे उड़ गए, वहां से मेरी बाइक गायब हो चुकी थी। मुश्किल से 10 मिनट भी नहीं हुए होंगे मुझे बाइक  पार्क किये हुए और बाइक  गायब। बड़े ही शातिर चोर हो गए हैं। तभी मैंने अपने हाथ में चाभी के गुच्छे की ओर देखा तो ये एहसास हुआ की मैं  ये क्या पागलपन कर रहा था। अब मैं बाइक या साइकिल से नहीं बल्कि कार से चलता हूँ , शायद मैं अब बड़ा हो गया हूँ। 
खैर ये सब तो हर किसी की ज़िन्दगी में होता है, आहा ज़िन्दगी की बात आई तो याद आया कि आजकल ऑफिस में काफी उथल-पुथल मची हुई है। हर कोई एक दूसरे का काम लगाने में लगा हुआ है। बस मौका मिला नहीं की बॉस के सामने घडियाली आंसू बहाना शुरू। खैर ऐसा  तो हर ऑफिस में होता होगा, हैना? आज स्कूल के दोस्त बहोत याद आते हैं, उनकी बातें, उनसे लड़ाई , सब में एक अलग अपना पण था। दोस्त तो आज हमारे इर्द गिर्द भी बहोत से हैं , लेकिन ये ,ऐसे दोस्त हैं कि इनके रहते दुश्मनों की कमी कह्लेगी नहीं। दोस्तों की जब कमी खलती है तो एहसास होता है की हाँ सही में आज मैं बड़ा हो गया हूँ।

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